जानिए कालपी की कुछ ऐतिहासिक तथ्य | कालपी का इतिहास

जानिए कालपी की कुछ ऐतिहासिक तथ्य | कालपी का इतिहास

जानिए कालपी की कुछ ऐतिहासिक तथ्य | कालपी का इतिहास

कालपी बुंदेलखंड का प्रवेश द्वार है यह यमुना नदी के तट पर बसा हुआ है। यह महर्षि वेदव्यास का जन्म स्थान है माना जाता है कि कालपी, प्राचीन काल में 'कालप्रिया' नगरी के नाम से विख्यात थी, समय के साथ इसका नाम संक्षिप्त होकर कालपी हो गया। कहा जाता है कि इसे चौथी शताब्दी में राजा वसुदेव ने बसाया था। यह बीरबल का जन्म स्थान है जो अकबर के नवरत्न में से एक थे यह नगर यमुना नदी के किनारे कानपुर-झाँसी राजमार्ग पर स्थित है।

कालपी-जालौन-पर्यटन 

प्राचीन विश्व: लगभग 45,000 ईसा पूर्व मानव समूहों ने प्राचीन कालप्रियनगरी पर कब्जा कर लिया था। कालपी में रेल और सड़क पुल के बीच यमुना नदी खंड के तलछट में क्षेत्र की जांच मानव व्यवसाय साबित हुई। कशेरुकी जीवों के विभिन्न प्रकार के अवशेषों के अलावा, हाथी का दांत, हाथी का कंधे का ब्लेड, इक्वस के दाढ़, बोविड्स, बोस आदि भी कुछ छोटे कंकड़ उपकरण, कुछ गुच्छे और चिप्स, साथ ही आंशिक रूप से जलने के सबूत के साथ हड्डी के औजारों की अच्छी संख्या की खोज की गई। यहां। हड्डियों ने जानबूझकर मानवीय कारीगरी और कालापन प्रभाव डाला। कुछ विद्वानों ने सभ्यता को c. 30,000 ई.पू. उत्तर प्रदेश के पुरातत्व विभाग ने हाल ही में कालपी में एक प्रागैतिहासिक स्थल की खोज की है।

वेद  व्यास मंदिर कालपी

ऋषि वेद व्यास का जन्म स्थान, महाभारत के रचयिता यानी महाभारत के लेखक - वेदवास के जन्म स्थान काल्पी है।कालपी नगर के मदारपुर स्थित यमुना किनारे स्थित व्यास मंदिर के पुजारी प्रशांत नायक, वेंकटेंश माल्या, सूरज भट्ट ने शुक्रवार की शाम पूजा अर्चन कर कपाट बंद कर दिए। शनिवार की सुबह तकरीबन पांच बजे जब वह पूजा अर्चना के लिए गए तो मंदिर गेट से लेकर अंदर तक सभी ताले टूटे थे। गर्भगृह से भगवान वेद व्यास की पंचधातु की बेशकीमती मूर्ति, लक्ष्मी नारायन की मूर्ति, दो सोने की भगवान की माला, सोने का मुकुट, लॉकेट, सोने का विमान, चांदी का सिंहासन, शालिग्राम भगवान, छह चांदी की कटोरी, एक बड़ा कटोरा आदि गायब थे। पुजारियों ने मंदिर के सहयोगी राजीव पुरवार को जानकारी दी। उन्होेंने तत्काल कोतवाली पुलिस को सूचना दी। मौके पर सीओ ओमकार सिंह, फिंगर प्रिंट टीम के साथ मौके पर पहुंचे और साक्ष्य संकलन कर एक संदिग्ध को हिरासत में ले लिया। वहीं लोगों का कहना है कि चोर रातभर चोरी करते रहे लेकिन चौकीदार मानबहादुर को इसकी भनक तक नहीं लगी। एसपी राकेश शंकर ने बताया कि शीघ्र ही चोरी का खुलासा कर लिया जाएगा। मंदिर परिसर में नदी के जलधारा से हो रहे कटान को रोकने के लिए वर्ष 2007 में पूर्व मंत्री रहे श्रीराम पाल ने सकारात्मक पहल की थी। उन्होंने पूरे मंदिर परिसर में बोल्डर फिटिग के लिए 60 लाख का प्रस्ताव शासन को दिया था लेकिन यह प्रस्ताव बाद में खारिज कर दिया गया था। जब कि बाद में पर्यटन विभाग ने 9 लाख रुपये खर्च कर बोल्डर लगवाये थे। इसी प्रकार वर्ष 1995 में यहां एक मिलन केंद्र बनवाया गया था। हाल ही में स्थानीय विधायक नरेंद्र पाल सिंह ने करीब 50 लाख का प्रस्ताव शासन से स्वीकृत कराया है। उनका दावा है कि धन मिलते ही मंदिर का कायाकल्प कराया जाएगा। प्रमुख समस्याएं :

मां वनखंडी

आषाढ़ मास के आखिरी शुक्रवार को मां वनखंडी के दरबार में हजारों श्रद्धालुओं ने मत्था टेककर मन्नत मांगी, सैकड़ों की संख्या में भक्तों ने हलुआ, पूड़ी का भोग लगाकर पूजा-अर्चना की।मंदिर में मन्नत पूरी होने पर हलुआ, पूड़ी चढ़ाने की प्रथा करीब डेढ़ सौ वर्ष पुरानी है। आषाढ़ के पूरे महीने में लोग आते हैं, लेकिन आषाढ़ के आखिरी शुक्रवार को भारी संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगता है। पहले मंदिर में जो डाली चढ़ती थी, उसका प्रसाद वहीं मंदिर प्रांगण में ग्रहण करने का नियम था। लेकिन भारी भीड़ की वजह से लोग डाली चढ़ाकर सार्वजनिक स्थानों एवं रिश्तेदारों के यहां ग्रहण करते हैं। मंदिर के महंत जमुनादास जी महाराज ने बताया कि इस बार आषाढ़ माह में हमीरपुर, औरैया, झांसी, कानपुर नगर, कानपुर देहात, बांदा, महोबा से मैया के दर्शन करने हजारों श्रद्धालु यहां आए और मैया की कृपा से अभी तक किसी भी प्रकार की कोई घटना नहीं घटी। उन्होंने बताया कि श्रद्धालुओं को पीने के पानी के लिए नलकूप के साथ-साथ पानी की टंकियां व हैंडपंप लगे हैं तथा मंदिर प्रांगण में छाया का इंतजाम किया जाता है।

लंका मीनार

ये खास जगह उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में स्थित है, जिसे कालपी के नाम से जाना जाता है। यहां एक मीनार भी है, जिसे लंका मीनार कहा जाता है। इस मीनार में रावण और उनके परिवार के पूरे सदस्यों की मूर्तियां लगाई गई हैं। इस मीनार की ऊंचाई 210 फीट है, जिसे मथुरा प्रसाद नाम के शख्स ने 1 लाख 75 हजार रुपये खर्च कर बनवाया था। इस लंका मीनार का निर्माण इसी कलयुग में हुआ, जिसे लेकर लोगों के दिमाग में तरह-तरह के सवाल रहते हैं। लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कोई रावण के लिए मीनार का निर्माण क्यों करवाएगा। जबकि महापंडित होने के बावजूद रावण ने सीता माता का अपहरण किया था। इस मीनार से जुड़ी दो बेहद ही खास बातें हैं। पहली खास बात ये है कि इस मीनार का निर्माण कराने वाले मथुरा प्रसाद रामलीला में कई सालों तक रावण का रोल करते रहे थे। जिसकी वजह से उन्हें, उनके असली नाम से कम और रावण के नाम से ज़्यादा पहचान मिली। मथुरा प्रसाद ने साल 1857 में बनवाया था, जिसे बनाने में बीस साल का लंबा समय लगा। मीनार में एक शिव मंदिर भी बना है, जिसके पीछे की मुख्य वजह यही थी कि रावण भगवान शिव के भक्त थे। इस मीनार की चढ़ाई करने में कुल सात परिक्रमा लगानी पड़ती है। यही वजह है कि यहां किसी भाई-बहन को नहीं आने की सलाह दी जाती है। लोगों का मानना है कि यहां किसी लड़की के साथ आने वाले लड़के के सात-फेरे हो गए हैं। हिंदू रीति-रिवाज़ों के अनुसार किसी लड़की के साथ सात-फेरे लेने वाले लड़का उसका पति माना जाता है।

कालपी किले घाट

कालपी का किला यमुना नदी के ऊपर मिट्टी की चट्टानों पर स्थित है। यह तीन तरफ से दीवार से घिरा हुआ है और चौथी तरफ चट्टानों और नदी द्वारा बचाव किया गया है। कालपी किला एक आयताकार संरचना है जिसके शीर्ष पर एक गुंबद है और यह नदी के तल से 120 फीट ऊपर है। किले की दीवार 9 फीट मोटी है। कालपी किला चंदेलों का गढ़ था। यह दिल्ली के सुल्तानों की महत्वपूर्ण स्थिति और यमुना के साथ संचार की रेखा भी थी। मराठों के दौरान किले ने खजाने के रूप में कार्य किया। वर्तमान में किले का उपयोग वन विभाग के विश्राम गृह के रूप में किया जाता है।

सतमठिया: महमूद खान लोधी ने लहरिया राजा श्रीचंद को मारने के बाद उनकी सात रानियों को चिता (सती) में जला दिया। उनकी याद में यमुना नदी के तट पर एक टीले पर सात छोटे मंदिर या 'मठियां' बनाई गईं। इन मंदिरों को सतमाथिया के नाम से जाना जाता है। यह जगह घने बीहड़ जंगल के अंदर है और सड़क मार्ग से यहां पहुंचना बहुत मुश्किल है। लेकिन अगर कोई यमुना के नीचे की ओर जाता है तो पहुंच बहुत आसान हो जाएगी

चौरासी गुंबद

चौरासी गुंबद (84 गुंबद) एक दीवार वाले आंगन में एक चौकोर नौ गुंबद वाली संरचना है जिसमें केंद्रीय गुंबद के नीचे दो कब्र हैं। 15 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध या 16 वीं शताब्दी की शुरुआत में इस गुंबद को सौंपी जाने वाली संभावित तिथि। यह इस्लामी वास्तुकला लोदी सुल्तान में से एक की मकबरा माना जाता है। इसमें 84 दरवाजे मेहराब हैं। मलबे के ब्लॉक का निर्माण पूरे भवन को शतरंज के रूप में स्क्वायर रिक्त स्थान में विभाजित किया गया है, खंभे से जुड़ी खंभे की आठ पंक्तियों और एक फ्लैट छत से ऊपर की ओर। इमारत में 60 फीट की ऊंचाई का गुंबद है। गुंबद की दीवार में जौनपुरी आदर्शों को देखा जा सकता है। यह पुराने कालपी के पश्चिम में ओएचई की तरफ एनएच 25 के साथ स्थित है। यह स्मारक मध्ययुगीन काल (लोढ़ी सुल्तानों) से शाही मकबरा है। प्राचीन काल में कल्पि को कालप्रिया नागरी के नाम से जाना जाता था। समय बीतने के बाद शहर का नाम कल्पी को संक्षिप्त किया गया था। कल्पनाप्रियागरी एक प्राचीन भारतीय शहर है। इसमें फुटबॉल मैदान के आकार का एक सूर्य मंदिर था या यहां तक ​​कि बड़ा भी था। यह चौथी शताब्दी में था कि राजा वासुदेव ने काल्प की स्थापना की थी। कहा जाता है कि यह शहर ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीन मुख्य हिंदू देवताओं द्वारा संरक्षित किया जाता है।

कालपी की प्रसिद्ध मिठाई गुझिया

राहुल भाषण खत्म कर वैन में बैठ चुके थे। क्षण भर में वे फिर बाहर निकले। साथ में सुरेंद्र सरसेला भी थे। हाथों में माइक संभालकर राहुल मुस्करा कर बोले-भइया हमें गुझिया नही खिलाओगे ? ऐसा सुनते ही कालपीवासी खुश हो गये। यहां का प्रमुख मिष्ठान गुझिया है। फौरन दो प्लेटों में गुझिया भेजी गई। राहुल ने स्वयं झुककर प्लेट लपकी और गुझिया का एक पीस उठाकर खा लिया। उन्हें स्वाद अच्छा लगा तो खुद एक गुझिया उठाकर फिर खा ली। इसके बाद प्लेट एसपीजी कमांडों की तरफ बढ़ा दी। गुझिया खाने को एसपीजी कमांडों पहले राहुल की तरफ न पहुंच पाने की कोशिश में लगे रहे बाद में स्वयं गुझिया के स्वाद का आनंद उठाया। राहुल इस पर भी नही रुके। उन्होंने नीचे खड़े उस व्यक्ति से वह डिब्बा भी मांगकर ऊपर रख लिया जिसमें 10-15 पीस गुझिया थी।
यह सब देख कालपी के लोग खुश हो गये। उन्हें अच्छा लगा कि कालपी की प्रसिद्ध मिठाई का स्वाद राहुल ने भी उठाया।

ब्रिटिश शासन:

कालपी को १८०२ में अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया था और यह भारत की आजादी तक ब्रिटिश कब्जे में रहा। कालपी 1811 में गठित बुंदेलखंड एजेंसी का एक हिस्सा था। इसमें 1818 से 1824 तक बुंदेलखंड एजेंसी का मुख्यालय भी था। इस अवधि के दौरान भारत के गवर्नर जनरल के राजनीतिक एजेंट को नियुक्त किया गया था और मुख्यालय कालपी में था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने वाणिज्यिक निवेश प्रदान करने के लिए इसे अपने प्रमुख स्टेशनों में से एक बना दिया।

कालपी युद्ध:

महारानी लक्ष्मीबाई, नानारोआ, तात्या टोपे और उनके अनुयायियों ने कालपी में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जब कानपुर में विद्रोह की खबर कालपी पहुंची, तो 53 नेटिव इन्फैंट्री के जवानों ने अपने अधिकारियों को छोड़ दिया। कई यूरोपीय लोगों की हत्या कर दी गई। मई 1858 में स्वतंत्रता सेनानियों को अंततः सर ह्यूज रोज (लॉर्ड स्ट्रैथनैर्म) और उनकी सेना ने पराजित किया। हजारों भारतीयों को फांसी दी गई और कई कानपुर भाग गए। १८५७ से पूर्व कालपी की जनसंख्या १,००,००० थी जबकि १८५७ के बाद की जनगणना केवल ९,००० दर्शाती है। कालपी की लड़ाई ह्यू रोज के सैनिकों को संभालने का एक बेहतरीन उदाहरण थी जिसमें उन्होंने एक शानदार युद्धाभ्यास का सहारा लिया जिससे उनके हताहतों की संख्या में काफी कमी आई। इस लड़ाई में ब्रिटिश हताहतों की संख्या सिर्फ 31 मारे गए और 57 घायल हो गए।

मुस्लिम काल:

1196 में जब मुहम्मद गोरी के वायसराय कुतुब-उद-दीन-ऐबक ने इसे जीत लिया, तो कालपी मुस्लिमों के हाथ में आ गया। बाद के मुस्लिम काल के दौरान इसने मध्य भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। १५वीं शताब्दी की शुरुआत में तैमूर के आक्रमण के बाद कालपी थोड़े समय के लिए स्वतंत्र हो गया। इसके बाद जौनपुर के इब्राहिम साह ने इसे शर्की सल्तनत में मिलाने की मांग की। दिल्ली के मुबारक शाह सैय्यद के एक जवाबी हमले ने इसे वापस पा लिया। दिल्ली-जौनपुर युद्ध के बाद इसे मालवा के हुसंग शाह गौरी ने जब्त कर लिया था। शर्की सल्तनत के बहलुल लोदी के पतन के साथ; कालपी दिल्ली सल्तनत में वापस आ गया। बहलूल ने कुतुब खान लोदी को राज्यपाल नियुक्त किया। इसके बाद यह मुगलों के हाथों में आ गया और अकबर के अधीन एक सरकार और एक तांबे की टकसाल के मुख्यालय के रूप में कार्य किया। इस शहर को 'पश्चिम का द्वार' भी कहा जाता है।

 

 

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